
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हर साल 21 जुलाई का दिन बेहद खास होता है। इस दिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी सबसे बड़ी वार्षिक ‘शहीद दिवस रैली’ आयोजित करती है। लेकिन इस बार, यह ऐतिहासिक रैली गंभीर कानूनी और सियासी पचड़े में फंस गई है। कोलकाता पुलिस द्वारा रैली की अनुमति न दिए जाने के बाद, टीएमसी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां 15 जुलाई को इस मामले पर अहम सुनवाई होनी है।
क्यों खड़ा हुआ यह पूरा विवाद?
टीएमसी हर साल की तरह कोलकाता के एस्प्लेनेड स्थित विक्टोरिया हाउस के सामने यह रैली करना चाहती है। मामला तब उलझ गया जब पुलिस ने इसकी इजाजत देने में देरी की और पार्टी को अदालत जाना पड़ा। सोमवार को न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की पीठ के सामने इस पर जल्द सुनवाई की मांग रखी गई, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
विवाद के पीछे तीन सबसे बड़े कारण हैं:
BNSS की धारा 163 का हवाला: कोलकाता पुलिस का तर्क है कि एस्प्लेनेड शहर का सबसे व्यस्त और संवेदनशील इलाका है। वहां सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को देखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (जो पहले धारा 144 थी) लागू है, इसलिए इतनी बड़ी भीड़ को अनुमति नहीं दी जा सकती।
अपनों की ही बगावत: टीएमसी की मुश्किलें तब और बढ़ गईं, जब पार्टी से अलग हुए बागी गुट (जिसका नेतृत्व विधायक ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं) ने भी उसी दिन और उसी जगह अपनी रैली करने का दावा ठोक दिया। चर्चा तो यह भी है कि प्रशासन ने इस बागी गुट को अनुमति दे भी दी है।
बैंक खातों पर ताला: ममता बनर्जी की टेंशन सिर्फ रैली तक सीमित नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के चलते पार्टी के 15 बैंक खातों को सीज कर दिया गया है, जिससे लगभग 1000 करोड़ रुपये फ्रीज हो गए हैं। इस आर्थिक झटके के बीच रैली के आयोजन पर संकट के बादल और गहरे हो गए हैं।
टीएमसी के लिए क्यों इतनी महत्वपूर्ण है ’21 जुलाई’?
नए पाठकों या जो बंगाल की राजनीति को करीब से नहीं जानते, उनके मन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर इस एक दिन के लिए इतनी रार क्यों है?
इतिहास का वो दर्दनाक पन्ना: बात 21 जुलाई 1993 की है। ममता बनर्जी उस समय युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। उन्होंने चुनाव में पारदर्शिता के लिए ‘फोटो पहचान पत्र’ अनिवार्य करने की मांग को लेकर राइटर्स बिल्डिंग तक मार्च निकाला था। इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बेरहमी से गोलियां चलाईं, जिसमें 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जान चली गई।
ममता बनर्जी इस दिन को लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान मानती हैं। 1998 में जब उन्होंने अपनी अलग पार्टी (TMC) बनाई, तब से हर साल 21 जुलाई को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह मंच सिर्फ शहीदों को श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि हर साल टीएमसी के लिए अपनी जमीनी ताकत दिखाने और कार्यकर्ताओं को भविष्य का राजनीतिक संदेश देने का सबसे बड़ा जरिया रहा है।
विपक्ष का तीखा हमला
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्षी दल भाजपा भी हमलावर है। भाजपा नेता अग्निमित्रा पॉल ने टीएमसी पर तंज कसते हुए कहा है कि ममता बनर्जी की पार्टी अब बिखर चुकी है और “टुकड़े-टुकड़े गैंग” में तब्दील हो गई है। उन्होंने चुनौती दी कि अगर टीएमसी में दम है, तो वह एस्प्लेनेड की जिद छोड़कर ‘ब्रिगेड परेड ग्राउंड’ जैसे बड़े मैदान में रैली करके दिखाए।



